इस्लाम क्या है ?

इस्लाम शब्द का अर्थ होता है ‘सुपुर्दगी, आत्मसमर्पण, अम्नों शान्ति, सुरक्षित आदि अर्थात अपने आपको बिना किसी शर्त के अल्लाह तआला के हवाले (Surrender) कर देना है। मतलब कि अल्लाह की इच्छा के अनुसार पूर्ण रुप से अपने आप को परिवर्तन कर देना और पारिभाषिक मतलह होता हैः “ अल्लाह के शिक्षा को स्वीकार कर लेना, उसके प्रति नत मस्तक हो जाना, और अपने सर्व स्वार्थ को अल्लाह के अधिन कर देना तथा सम्पूर्ण जीवन में अल्लाह का अधिकारी व भक्त बन जाना, केवल उसी को उपास्य और पूज्य मानना, केवल उसी से प्रार्थना करना तथा उसका दास व भक्त बन जाना और अपना पूर्ण जीवन उसी के बनाए हुए नियम व आदेशानुसार व्यतीत करना, इसी सिद्धान्त के अनुसार ‘पवित्र क़ुरआन’ मानव जीवन का पूर्ण विधान है।

नबी मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने इस्लाम के स्तम्भ के प्रति स्पष्ट कर दिया हैः जैसा कि हदीस जिबरील में वर्णन हैः

ثم قال: يا محمدُ أخبرني عن الإسلامِ؟ قال: أن تشهد أن لا إله إلا الله وأن محمدًا رسولُ اللهِ، وتقيمَ الصلاةِ وتؤتيَ الزكاةِ، وتصومَ رمضانَ، وتحجَّ البيتَ إنِ استطعتَ إليه سبيلًا .(صحيح مسلم و سنن النسائ: 5005)

 फिर (जिबरील ने कहा) ने कहाः  ऐ मुहम्मद! मुझे इस्लाम के प्रति बताओ? तो रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमायाः इस्लाम यह है कि तुम गवाही दो कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य माबूद (पुज्य) नहीं और मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अल्लाह के रसूल हैं और नमाज़ क़ायम करो, ज़कात (दान) दो, रमज़ान महीने के रोज़े रखो, और यदि अल्लाह के घर आने जाने की शक्ति है तो उस के घर का हज्ज करो….. (सही मुस्लिमः , सुनन नसईः 5005)

दुसरी हदीस में यह स्पष्ट वर्णन है कि इस्लाम पाँच स्तम्भों पर आधारित है जिन्हें नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के इस फरमान के द्वारा स्पष्ट किया गया है:

بُنِي الإسلامُ على خمسٍ: شَهادةِ أن لا إلهَ إلا اللهُ وأنَّ محمدًا رسولُ اللهِ ، وإقامِ الصلاةِ ، وإيتاءِ الزكاةِ ، والحجِّ ، وصومِ رمضانَ- (صحيح البخاري: 8 و صحيح مسلم: 16)

” इस्लाम की नीव पाँच चीज़ों पर आधारित हैः इस बात की गवाही देना कि अल्लाह के अलावा कोई सच्चा पूज्य (मा’बूद) नहीं, और मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अल्लाह के सन्देष्टा हैं, नमाज़ क़ायम करना, ज़कात देना, हज्ज करना और रमज़ान के महीने के रोज़े रखना।” (बुखारी हदीस संख्याः 8 तथा मुस्लिमः 16)