दावत हमारी ज़िम्मेदारी है

सबसे बेहतर काम जिस में एक मुसलमान का दिन और रात गुजरना चाहिए वह अल्लाह के रास्ते में दावत है, और क्यों ना हो कि यह नबियों और संदेष्टाओं का काम है, इसके महत्व को समझने के लिए यह जान लेना काफी है कि अल्लाह ने उसे सब से बेहतर काम बताया है और उसकी ओर आकर्षित किया है, अल्लाह ने फरमाया:

 وَمَنْ أَحْسَنُ قَوْلًا مِّمَّن دَعَا إِلَى اللَّـهِ وَعَمِلَ صَالِحًا وَقَالَ إِنَّنِي مِنَ الْمُسْلِمِينَ   ( سورة فصلت 33)

“और उस व्यक्ति से बात में अच्छा कौन हो सकता है जो अल्लाह की ओर बुलाए और अच्छे कर्म करे और कहे, “निस्संदेह मैं मुस्लिम (आज्ञाकारी) हूँ?”  (सूरः फुस्सिलत 33)

जी हाँ! ना केवल यह कि वह इस्लाम की ओर लोगों को बुलाए बल्कि उसे अपने इस्लाम पर गर्व हो. और गर्व से कहे कि मैं मुसलमान हूं।

और जो लोग दावत का काम करते हैं वे दुनिया में सबसे बेहतर लोग हैं: अल्लाह ने फरमाया:

كُنتُمْ خَيْرَ أُمَّةٍ أُخْرِجَتْ لِلنَّاسِ تَأْمُرُونَ بِالْمَعْرُوفِ وَتَنْهَوْنَ عَنِ الْمُنكَرِ وَتُؤْمِنُونَ بِاللَّـهِ ۗ ( سورة آل عمران 110)

” तुम एक उत्तम समुदाय हो, जिसे लोगों के समक्ष लाया गया है। तुम नेकी का हुक्म देते हो और बुराई से रोकते हो और अल्लाह पर ईमान रखते हो।”  (सूरः आले इमरान 110)

जब हमने अल्लाह को पहचान लिया, उसके आदेशानुसार जीवन बिताने लगे तो अब जिम्मेदारी यह बन गई कि हम जिस नेमत में पल रहे हैं उस से दूसरों को भी अवगत करायें.

और याद रखें कि दावत कोई एख़तियारी काम नहीं है बल्कि वाजबी और ज़रूरी काम है, इसी में हमारी सफलता, हमारी सआदत और हमारा उद्धार है, इसके बिना हमारी विफलता, परेशानी और बरबादी है. बल्कि आज हम इतनी सारी जो दुआएं करते हैं वे स्वीकार क्यों नहीं की जातीं? कारण स्पष्ट है कि हमने दावत के रास्ते में कोताही की, सुनन तिर्मिज़ी की रिवायत है अल्लाह के रसूल सल्ल. ने कहाः

والذي نفسي بيدِه لتَأمرُنَّ بالمعروفِ ولتَنهوُنَّ عن المنكرِ أو ليُوشِكَنَّ اللهُ أن يَبعثَ عليكمْ عقابًا منهُ فتدعونهُ فلا يَستجيبُ لكمْ  (سنن الترمذى 2169)

क़सम है उस जात की जिसके हाथ में मेरी जान है, तुम निश्चित भलाई की ओर निमंत्रण दो और बुराई से रोको, वरना करीब है कि अल्लाह तुम पर अपना प्रकोप भेज दे और तुम दुआ भी करो तो स्वीकार न की जाए।

इस लिए एक मुसलमान को चाहिए कि जिंदगी में अपने वजूद के उद्देश्य को समझे। यही उद्देश्य समझा था हज़रत रिबई बिन आमिर रज़ियल्लाहु अन्हु ने जब कि फारस के राजा रुस्तम के दरबार में उसे सम्बोधित करते हुए कहा थाः

الله ابتعثنا لنخرج من شاء من عبادة العباد إلى عبادة الله، ومن ضيق الدنيا إلى سعتها، ومن جور الأديان إلى عدل الإسلام       البداية و النهاية

” हम ऐसी क़ौम हैं जिसे अल्लाह ने इस लिए वजूद में लाया है ताकि वह जिसे चाहे उसे हम बन्दों की इबादत से निकाल कर अल्लाह की इबादत की ओर, दुनिया की तंगी से निकाल कर दुनिया की विशालता की ओर और धर्मों के अत्याचार से निकाल कर इस्लाम के न्याय की ओर ले जाएं।”

इस्लाम की ओर बुलाना भलाई का ऐसा द्वार है जो कभी बंद नहीं होता .सही मुस्लिम की रिवायत है, अल्लाह के रसूल सल्ल. ने कहाः

من دَلَّ على خيرٍ فله مثلُ أجرِ فاعلِه  رواه مسلم 1893

” जिसने किसी भलाई की ओर बुलाया उसे भलाई करने वाले के जैसे पुण्य मिलता है।” अर्थात् यदि आप किसी को किसी भलाई की ओर बुलाते हैं तो जो भी यह भलाई करेगा आपको बुलाने की वजह से उसके बराबर सवाब मिलेगा और उसके सवाब में कोई कमी न होगी.

जब अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु को ख़ैबर के अवसर पर झंडा दे थे तो उन्हें संबोधित करते हुए यहां तक ​​कहा थाः

فوالله لأَن يهديَ اللهُ بك رجلاً واحداً ، خيرٌ لك من أن يكونَ لك حُمْرُ النَّعَمِ ( صحيح البخارى4210، صحيح مسلم 2406 )

“अल्लाह की क़सम! हे अली, अगर अल्लाह तुम्हारे द्वारा एक आदमी को सही रास्ता दिखा दे तो यह तुम्हारे लिए अरब के लाल ऊंट से बेहतर है.” रेड कलर का ऊंट अरब में बहुत महत्व रखता था, जैसे आज के डेट में कहा जाए कि तुम्हारे लिए मर्सिडीज़ कार से अच्छा है.

आज हम धरल्ले से कहते हैं कि हमें अल्लाह से मुहब्बत है अपने माँ बाप और दुनिया की सारी चीज़ों से अधिक, लेकिन कभी हमने विचार किया कि क्या सच में यह अर्थ हमारे जीवन में पाया जाता है, क्या वास्तव में हम अपने माता पिता से अधिक अल्लाह से प्यार करते हैं?

अगर कोई आपके गाइबाना में आपके घर आता है और आपकी मां को खूब गालियां देता है और अश्लील बातें सुनाता है, जब आप घर आते हैं और सुनते हैं कि फ़लां ने आपके घर आकर आप की मां को खूब गालियां दीं और अश्लील बातें सुनाई हैं, जरा दिल पर हाथ रख कर उत्तर दीजिएगा क्या आप यह सुनकर आपे से बाहर न हो जाएंगे? और आप उसके पास जाकर उससे बदला लेना नहीं चाहेंगे? बल्कि अगर आप शक्ति नहीं रखते हों तो परिवार वालों को बुलाएंगे ताकि किसी तरह इस ज़ालिम से बदला लिया जा सके, हम यहाँ आप के साथ हैं कि किसी ने अपनी माँ को गाली दी तो बदला लेने के लिए तैयार हो गए, यह अच्छी बात है। लेकिन ज़रा आगे आइए और हमें उत्तर दीजिए कि क्या हमारा ऐसा ही मामला अपने अल्लाह के साथ है जबकि हम अल्लाह से अपनी माँ से भी अधिक प्यार करते हैं। क्या आप जानते हैं कि अल्लाह के लिए सब से बड़ी गाली क्या है, सूरः मरयम की आयत नम्बर 88 से 92 तक पर विचार कीजिए:

وَقَالُوا اتَّخَذَ الرَّحْمَـٰنُ وَلَدًا  ⃰  لَّقَدْ جِئْتُمْ شَيْئًا إِدًّا  ⃰  تَكَادُ السَّمَاوَاتُ يَتَفَطَّرْنَ مِنْهُ وَتَنشَقُّ الْأَرْضُ وَتَخِرُّ الْجِبَالُ هَدًّا  ⃰  أَن دَعَوْا لِلرَّحْمَـٰنِ وَلَدًا  ⃰  وَمَا يَنبَغِي لِلرَّحْمَـٰنِ أَن يَتَّخِذَ وَلَدًا  ⃰    سورة مريم 88-92

वे कहते हैं, “रहमान ने किसी को अपना बेटा बनाया है।” (88) अत्यन्त भारी बात है, जो तुम घड़ लाए हो! (89) निकट है कि आकाश इस से फट पड़े और धरती टुकड़े-टुकड़े हो जाए और पहाड़ धमाके के साथ गिर पड़े, (90) इस बात पर कि उन्होंने रहमान के लिए बेटा होने का दावा किया! (91) जबकि रहमान की प्रतिष्ठा के प्रतिकूल है कि वह किसी को अपना बेटा बनाए (92)

जरा विचार करें अल्लाह का बेटा बनाना या उसका साझी ठहराना अल्लाह के लिए इतनी बड़ी गाली है कि इस गाली के कारण क़रीब है कि आकाश फट पड़े, धरती टुकड़े टुकड़े हो जाए और पहाड़ गिर पड़े, आज हम प्रति दिन सुनते हैं और देखते हैं कि हजारों लोग अल्लाह का साझी ठहराते हैं और उसके लिए बेटा मानते हैं लेकिन वह मुसलमान जो अपने रब से मुहब्बत का दावा करता है उसे इसका एहसास भी नहीं है, उसके कानों में जूं तक नहीं रेंगती. अंत कैसे कहा जाए कि हम अपनी माँ से अधिक अल्लाह से प्यार करते हैं, हम ज़बान तक नहीं खोल सकते बदला लेना तो बहुत दूर की बात है, और इस्लाम हमें बदला लेने के लिए सिखाता भी नहीं है, क्योंकि वास्तव में उन्हें पता नहीं है कि हमारा वास्तविक मालिक कौन है? तो आइए वादा करते हैं कि हम दावत का काम करेंगे और भटके हुए इंसानों तक प्रेम और मुहब्बत से अल्लाह का संदेश पहुंचाएंगे.

आपके पास कंपनी है, सामान अच्छा से अच्छा बनाते हैं, लेकिन अगर उस की एडवर्टाइज़िंग  सही ढंग से नहीं करते तो सामान सुन्दर और और बेहतर होने के बावजूद उसका कोई महत्व नहीं होगी, बल्कि धीरे धीरे लोग उसे बेकार समझने लगेंगे. इस्लाम शांति का स्रोत है, मोक्ष का रास्ता है, सारी समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करता है, इंसान की लौकिक और पारलौकिक सफलता इसी में है, लेकिन इतना कहने से काम नहीं चलता, जरूरत है कि समय के अनुसार उसकी एडवर्टाइज़िंग हो।

एक ईसाई महिला के समक्ष जब एक इस्लामी दाई ने इस्लाम का परिचय कराया तो उसने इस्लाम के सम्बन्ध में सुनने के बाद कहाः यदि इस्लाम ऐसा ही है जैसा कि आपने बताया तो आप लोग बहुत बड़े ज़ालिम हैं। क्यों कि आपने इसके प्रचार का हक़ अदा नहीं किया।