एकेश्वरवाद की इस्लामी धारणा

इस समस्त संसार की रचना एक ही ईश्वर ने की है और इस संसार पर उसी एक ईश्वर का प्रभुत्व है, यह समझना कोई बहुत मुश्किल बात नहीं है। बल्कि यह तो एक ऐसा सत्य है जिसको समझने के लिए किसी प्रमाण और परीक्षण की आवश्यकता भी नहीं है। यह सत्य तो हर किसी के हृदय में स्वयं ही विद्यमान है और अवसर प्राप्त होते ही यह पूरी शक्ति से बाहर आ जाता  है। दूसरी ओर संसार की हर चीज़ भी चीख़-चीख़कर इसी बात की गवाही दे रही है कि इस समस्त संसार को बनाने वाला एक ही ईश्वर है।
‘‘धरती और आकाशों की रचना में और रात और दिन के बारी-बारी से आने में उन बुद्धिमानों के लिए बहुत-सी निशानियां हैं।’’ (क़ुरआन, 3:190)
मनुष्य की समस्या यह है कि वह इस संसार को कभी इस दृष्टि से देखता ही नहीं। वह यह तो देखता है और इसके लिए अपनी समस्त शक्ति का उपयोग भी करता है, कि इस संसार की प्रत्येक वस्तु को वह अपने जीवन के लिए कैसे उपयोगी बना सकता है। परन्तु इस सुन्दर और विशाल संसार और इसमें फैली हुई अनगिनत नेमतों का रचयिता कौन है इस ओर उसका ध्यान कभी नहीं जाता। वह एक आकर्षक और मोहित कर देने वाली चित्रकला को देखकर उसके चित्रकार की प्रशंसा करते नहीं थकता और उसका नाम जानने को व्याकुल हो जाता है, परन्तु इस संसार-रूपी चित्रकला को देखकर न तो उसके चित्रकार की प्रशंसा करता है, न ही उसके बारे में जानने की जिज्ञासा ही उसके हृदय में उत्पन्न होती है।
‘‘इन लोगों ने अल्लाह की क़द्र ही न की जैसा कि उसकी क़द्र करने का हक़ है...।’’ (क़ुरआन, 39:67)

एकेश्वरवाद (तौहीद) इसी शाश्वत सत्य को स्वीकार कर लेने का नाम है।

जिसने इस संसार की रचना की है वही इसका स्वामी है (उसी को होना भी चाहिए) और वही इसका संचालन एवं प्रबंधन भी कर रहा है (दूसरा कोई कर भी नहीं सकता)। यह एक ऐसा सत्य है जिसे समझने के लिए बुद्धि की बहुत अधिक मात्रा की आवश्यकता नहीं है। इस संसार में चारों ओर फैली हुई सुव्यवस्था, समन्वय और सामंजस्य इस बात का खुला प्रमाण है कि इस समस्त संसार पर अकेले उसी का प्रभुत्व है।
‘‘अगर आसमान और ज़मीन में एक अल्लाह के सिवा दूसरे पूज्य भी होते तो (ज़मीन और आसमान) दोनों की व्यवस्था बिगड़ जाती। अतः पाक है अल्लाह, सिंहासन का अधिकारी उन बातों से जो ये लोग बना रहे हैं।’’  (क़ुरआन, 21:22)
एकेश्वरवाद उसके स्वामित्व और उसके प्रभुत्व को स्वीकार कर लेने का नाम है।