क़ुरआन

 

 शाब्दिक अर्थ—क़ुरआन का शाब्दिक अर्थ है ‘पढ़ी जाने वाली चीज़’।
◌ पारिभाषिक अर्थ—इस्लाम की परिभाषा में क़ुरआन उस ईशग्रंथ को कहते हैं जो ईशग्रंथों की दीर्घकालीन श्रृंखला की अन्तिम कड़ी के रूप में अवतरित हुआ। इसका अवतरण जिस शब्द से शुरू हुआ। वह था–‘इक़रा’, यानी ‘‘पढ़ो!’’ लगभग 1400 वर्ष से अधिक काल बीता, एक दिन के भी अन्तर बिना यह ग्रंथ लगातार पढ़ा जाता रहा है। वर्तमान युग में किसी दिन-रात एक क्षण भी ऐसा नहीं बीतता जब विश्व के किसी न किसी भाग में यह पढ़ा न जा रहा हो। इस धरातल पर हर समय-बिन्दु पर कहीं न कहीं नमाज़ अवश्य पढ़ी जा रही होती है, और नमाज़ में क़ुरआन का कोई अंश, कोई भाग या कोई छोटा-बड़ा अध्याय पढ़ना अनिवार्य होता है। इसी प्रकार कहीं न कहीं क़ुरआन-पाठ (अर्थात् इसका पठन-पाठन, तिलावत) हर क्षण होता रहता है। यूँ यह ग्रंथ पूरे विश्व में सबसे अधिक ‘पढ़ी जाने वाली चीज़’ है।
◌ परिचय—ईशग्रंथ क़ुरआन, फ़रिश्ता ‘जिबरील’ के माध्यम से पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰) पर अरब प्रायद्वीप के शहर मक्का से मिले हुए पहाड़ी सिलसिले के एक पहाड़ की ‘हिरा’ नामक गुफ़ा में अवतरित होना आरंभ हुआ जिसमें आप कई-कई दिन-रात ध्यान-ज्ञान, चिन्तन-मनन (तहन्नुस) के लिए वास किया करते थे। परिस्थिति और आवश्यकतानुसार थोड़ा-थोड़ा करके हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) के पैग़म्बरीय जीवन में, आप (सल्ल॰) के देहावसान से आठ दिन पहले 31 मई 632 तक अवतरित होता रहा। इसका पूरा अवतरणकाल 7,959 दिन(21 साल 7 मास सौर-वर्ष 22, वर्ष 5 मास चान्द्र-वर्ष) है। क़ुरआन की भाषा अरबी है जो डेढ़ हज़ार साल बीतने पर भी बड़ी उन्नत, उत्कृष्ट, धनी, सजीव, सशक्त और आधुनिक शैली व व्याक्रण रखती है। इसमें छोटे-बड़े 114 अध्याय (सूरः) है लेकिन इसका अध्यायीकरण मानव-रचित पुस्तकों की भाँति, किसी विशेष विषय, तथा किसी निश्चित शीर्षक से संबंधित व्याख्या पर ही आधारित नहीं है बल्कि अधिकतर अध्यायों में बहुत सारे विषयों पर वार्ता की गई, आदेश-निर्देश, नियम, क़ानून दिए गए, शिक्षाएँ दी गईं, पिछली क़ौमों का वृत्तांत बयान किए गए, एकेश्वरत्व के पक्ष में तथा अनेकेश्वरत्व के खंडन में तर्क दिए गए हैं। स्वर्ग और नरक के प्रभावशाली चित्रण किए गए, मानवजाति की अन्तरात्मा, बुद्धि-विवेक एवं चिंतन-शक्ति को बार-बार आवाज़ देकर उसे एकेश्वरवाद का आह्वान दिया गया है। मनुष्य के व्यक्तित्व के दोनों अभाज्य पक्षों—आध्यात्मिकता व भौतिकता—में अति-उत्तम, अति-सुन्दर सामंजस्य व संतुलन को समाहित करने वाला जीवन-विधान सुझाया गया तथा उसे स्वीकार व ग्रहण करने पर उभारा गया है।
क़ुरआन में कुल 6,233 आयतें (वाक्य) हैं। अरबी वर्णमाला के कुल 30 अक्षर 3,81,278 बार आए हैं। ज़ेर (इ की मात्राएँ) 39,582 बार, ज़बर (अ की मात्राएँ) 53,242 बार, पेश (उ की मात्राएँ) 8,804 बार, मद (दोहरे, तिहरे ‘अ’ की मात्राएँ) 1771 बार, तशदीद (दोहरे अक्षर के प्रतीक) 1252 बार और नुक़ते (बिन्दु) 1,05,684 हैं। इसके 114 में से 113 अध्यायों का आरंभ ‘‘बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम’’ से हुआ है, अर्थात् ‘‘शुरू अति कृपाशील, अति दयावान अल्लाह के नाम से।’’ पठन-पाठन और कंठस्थ में आसानी के लिए पूरे ग्रंथ को 30 भागों में बांट कर हर भाग का नामांकरण कर दिया गया है। हर भाग ‘पारा’ (Part) कहलाता है।