क़ुरआन के वैज्ञानिक सत्य

क़ुरआन न हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) की रचना है, न किसी दूसरे इन्सान की। यह तो ईश्वर द्वारा अवतरित ग्रंथ है जो सभी इन्सानों के मार्गदर्शन के लिए भेजी गई है और मुसलमानों का इस पर कोई आधिपत्य नहीं है। इसकी अद्भुत शैली से यह बात स्वयं ही स्पष्ट हो जाती है कि यह एक ईश-ग्रंथ है और इसके लिए किसी अतिरिक्त प्रमाण की आवश्यकता नहीं पड़ती।
वैसे तो क़ुरआन विज्ञान की पुस्तक नहीं है परन्तु इसमें कुछ ऐसे वैज्ञानिक सत्य मौजूद हैं, जिन्हें अब से 1400 वर्ष पूर्व ईश्वर के अतिरिक्त कोई नहीं जान सकता था और जिनका ज्ञान इन्सान को बीसवीं शताब्दी में पहुंचकर अनेक उपकरणों का प्रयोग करने के बाद हुआ। यह इसके ईश-ग्रंथ होने का एक ठोस प्रमाण है। इन सभी अंशों को एकत्रित किया जाए तो एक लम्बी सूची बन जाएगी और अगर विस्तार से इनका वर्णन किया जाए तो अनगिनत पुस्तकें तैयार हो जाएंगी। इनमें से कुछ यहां संक्षेप में प्रस्तुत हैं।

विश्व की रचना

आधुनिक खगोल-भौतिकी (Astro Physics) इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि सम्पूर्ण विश्व एक महाविस्फोट के नतीजे में अस्तित्व में आया। इससे पूर्व न तो कोई भौतिक तत्व था, न ही समय। इसी शून्य की स्थिति से इस विश्व की रचना हुई। सन् 1992 में नासा ने COBE अन्तरिक्ष-यान द्वारा लिए गए चित्रों के आधार पर भी यही निष्कर्ष निकाला कि महाविस्फोट से ही इस विश्व का आरंभ हुआ है उससे पूर्व शून्य के अतिरिक्त कुछ भी नहीं था। क़ुरआन में ईश्वर ने इस सत्य को इस प्रकार व्यक्त किया है—
‘‘वह तो आकाशों और धरती का आविष्कारक है।’’ (क़ुरआन, 6:101)

संसार का विस्तार हो रहा है

इस विशाल संसार की सीमाएं स्थिर या स्थैतिक नहीं हैं बल्कि इनमें हर पल विस्तार हो रहा है। बीसवीं शताब्दी के आरंभ में रूस के भौतिक-शास्त्री अलेक्जेंडर फ्रीडमैन ने यह खोज की कि यह संसार स्थिर नहीं है और इसकी सीमाओं में निरंतर विस्तार हो रहा है। 1929 में ‘हबल’ दूरबीन से इसकी पुष्टि भी हो गई। इसके पहले हज़ारों वर्षों से यही धारणा थी कि यह विश्व एक स्थिर इकाई है।
अब से 1400 वर्ष पूर्व जबकि न तो भौतिक विज्ञान का कोई अस्तित्व था न दूरबीन का, क़ुरआन ने इस सत्य की घोषणा कर दी थी।
‘‘आसमान (अर्थात् ब्रह्माण्ड) को हमने अपने ज़ोर से बनाया और हम ही उसका विस्तार भी कर रहे हैं।’’ (क़ुरआन, 51:47)