परदा

इस्लाम में पर्दे की प्रथा का विरोध इस समय बहुत से देशों में हो रहा है। कई देशों ने तो पर्दे और स्कार्फ़ पर प्रतिबंध भी लगा दिया है। मुस्लिम महिलाओं को पर्दे के कारण बहुत से अवसरों पर भेदभाव का सामना भी करना पड़ रहा है। हर क्षेत्रा में व्यक्तिगत स्वतंत्रता की चर्चा तो बहुत है और हर कोई इस स्वतंत्रता का उपयोग करते हुए अपना मन-पसन्द जीवन व्यतीत कर रहा है, परन्तु ऐसा प्रतीत होता है जैसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता का क़ानून मुस्लिम महिलाओं पर लागू नहीं होता। 
इसी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सहारा लेकर दूसरी महिलाओं को अपने मनमाने वस्त्र धारण करने की पूरी आज़ादी है। सच तो यह है कि उन्हें वस्त्र धारण न करने की भी पूरी आज़ादी है। वो अगर पारदर्शी वस्त्र धारण करके अपने अंगों की नुमाइश (अंग-प्रदर्शन) करें तो इस पर किसी को कोई आपत्ति नहीं होती। उल्टे इसका विरोध करने वालों की ज़बान व्यक्तिगत स्वतंत्रता की धौंस देकर बन्द कर दी जाती है। वही लोग जो पर्दे का विरोध करते हैं, फ़ैशन परेडों में अर्धनग्न युवतियों के शरीर के एक-एक अंग को लालसा भरी दृष्टि से देखते नहीं थकते।
ये भी अपनी जगह सत्य है कि धर्म और आस्था के आधार पर ईसाई ननों को स्कार्फ़ लगाने और अपना पूरा शरीर ढकने की अनुमति तो है, परन्तु इसी आधार पर मुस्लिम महिलाओं को यह अधिकार देने को कोई तैयार नहीं है। एक स्त्री अगर पुरुष का वस्त्र धारण कर ले तो इस पर किसी को आपत्ति नहीं होती, परन्तु वही स्त्री अगर पर्दा या स्कार्फ़ लगा ले तो उस पर आक्षेपों की बौछार होने लगती है।
अख़बारों में, पत्रिकाओं में, फिल्मों में, टी॰वी॰ और इंटरनेट पर इस समय पूरी तरह से यौन अराजकता का बोलबाला है, इस पर किसी को कोई आपत्ति नहीं होती। हर तरफ़ युवक-युवतियों की कामुकता की भावना को प्रज्वलित करने की कोशिश की जा रही है, इस पर भी किसी को कोई आपत्ति नहीं होती। हर तरफ़ अभद्र और अश्लील विज्ञापनों की बाढ़ आई हुई है, परन्तु इस पर भी किसी को कोई आपत्ति नहीं होती। परन्तु अगर एक मुस्लिम महिला अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उपयोग करते हुए और अपने आपको पुरुषों को भूखी निगाहों से बचाने के लिए सभ्य और शालीन वस्त्र धारण कर लेती है तो पूरा समाज उसके विरोध में उठ खड़ा होता है।
समाज का चाहे आम नागरिक हो या बुद्धिजीवी वर्ग, पता नहीं किन अज्ञात कारणों से ये स्वीकार करने को तैयार नहीं है कि हर तरफ़ तेज़ी से फैलती हुई यौन अराजकता और बलात्कार का संबंध भड़कीले वस्त्रों से भी है और इनका संबंध हर तरफ़ फैले हुए उत्तेजित करने वाले विज्ञापनों से भी है और उन फिल्मों से भी है जो अश्लीलता और कामुकता को भड़काने में लगी हुई हैं। स्थिति कितनी भयावह है इसका प्रमाण इन आंकड़ों से लगाया जा सकता है। हमारे देश सन् 2010 में—

बलात्कार की घटनाएं  22,172
सम्बन्धियों द्वारा अपराध  94,041
अपहरण 29,795
छेड़छाड़ 40,613

 ये आंकड़े तब हैं जब 69 घटनाओं में से मात्र एक घटना दर्ज कराई जाती है।
कोई भी सभ्य और शालीन समाज इस स्थिति को स्वीकार नहीं कर सकता। इसके परिणाम बड़े ही भयावह होंगे। यह बात समझना भी कोई बहुत मुश्किल नहीं है कि मात्र पुलिस और क़ानून के भय से इस स्थिति पर क़ाबू नहीं पाया जा सकता।
इस्लाम ने, जो कि ईश्वर द्वारा रचित एक संपूर्ण जीवनशैली का नाम है, इस भयावह स्थिति को उत्पन्न होने से पहले ही इसे रोकने के कई उपाय किए हैं और इन्हें आस्था से जोड़ दिया है। यही कारण है कि मुस्लिम समाज में यौन अराजकता और बलात्कार का अनुपात बहुत कम है। पर्दा इन्हीं उपायों में से एक है। इन समस्त उपायों का सारांश निम्नलिखित बिन्दुओं से समझा जा सकता है—