तलाक़: नारी का अपमान नहीं

पिछले कई दशकों में दूसरे समुदायों में तलाक़ के प्रावधान को समाविष्ट किये जाने से यह सत्य अब पूरी तरह स्पष्ट हो गया है कि इस्लाम में तलाक़ के प्रावधान के विरुद्ध समस्त प्रचार भ्रामक एवं ग़लतफ़हमियों पर आधारित था। साथ ही यह बात भी स्पष्ट हो गई है कि इस्लाम में तलाक़ का प्रावधान समाज और परिवार की आवश्यकता के अनुरूप है न कि उसके विरुद्ध। इस प्रावधान की वास्तविकता को समझने के लिए इस्लाम में विवाह के प्रावधान को समझना आवश्यक है।
इस्लाम विवाह को मात्र काम-वासना की पूर्ति के माध्यम के रूप में नहीं देखता, बल्कि इसे समाज की स्थिरता एवं सुदृढ़ता के एक माध्यम के रूप में लेता है और उससे निम्नलिखित लक्ष्यों की प्राप्ति करता है—

(1) परिवार की स्थापना—जो समाज का एक मौलिक अंश है।
(2) संतान के पालन-पोषण का एक केन्द्र स्थापित करना।
(3) समाज के विस्तार में सहायक होना।
(4) काम-वासना की पूर्ति का नैतिक क़ानूनी प्रावधान प्रदान करना।

इन समस्त उद्देश्यों की पूर्ति के लिए इस्लाम जब पति और पत्नी को विवाह के माध्यम से जोड़ता है, तो इस संबंध को एक ‘‘अनुबंध’’ की शक्ल देता है और ये अनुबंध तब ही तक प्रभावी रहता है जब तक इन उद्देश्यों की पूर्ति संभव हो। यदि पति-पत्नी में ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाए कि इन उद्देश्यों की पूर्ति संभव न हो तो इस्लाम, समाज की स्थिरता एवं सुदृढ़ता को ध्यान में रखते हुए, पति-पत्नी को ये अनुमति देता है कि वो पुराने अनुबंध को तोड़ कर ऐसे नये अनुबंध स्थापित कर लें, जहां इन उद्देश्यों की पूर्ति सुन्दर रूप से हो सके।
इस दृष्टि से देखा जाए तो इस्लाम में तलाक़ का प्रावधान नारी पर अत्याचार और दासता का बोधक नहीं, बल्कि उसकी स्वतंत्रता का उद्घोषक है।
‘‘औरतों के लिए भी सामान्य नियम के अनुसार वैसे ही अधिकार हैं, जैसे मर्दों के अधिकार उन पर हैं।’’ (क़ुरआन, 2:228)
इस सत्य को और भी अच्छी तरह समझा जा सकता है, यदि हम इसे अन्य धर्मों में तलाक़ के प्रावधान की पृष्ठभूमि में देखें—
(1) सन् 1857 से पूर्व पश्चिमी समाज में तलाक़ का कोई प्रावधान नहीं था। एक बार विवाहित संबंध में जुड़ जाने के उपरांत उनके लिए मृत्यु के सिवा अलग होने का कोई रास्ता नहीं था, चाहे पारिवारिक जीवन पूर्ण रूप से नरक बन चुका हो और समाज को लाभ के बदले हानि पहुंचा रहा हो।
(2) भारतीय धर्मों में भी तलाक़ का कोई प्रावधान नहीं है और पत्नी की ‘‘डोली के बाद उसकी अर्थी ही निकलेगी’’ की धारणा आज भी मान्य है। सन् 1955 के हिन्दू विवाह क़ानून संशोधन ने भारतीय संविधान में तलाक़ का प्रावधान सम्मिलित किया और पत्नी को ये आज़ादी दी की वह अपनी मृत्यु से पूर्व भी, यदि आवश्यक हो तो, विधिवत दाम्पत्य संबंध से निकल सकती है।